बुधवार, 2 मई 2012

स्वास्थ्य पर मंडराता मोबाईल रेडियेशन का खतरा

स्वास्थ्य पर मंडराता मोबाईल रेडियेशन का खतरा

सरायपाली l मोबाइल फोन ने किस तरह जिंदगी में जगह बनाई है, वह देखना एक सुखद अनुभव है. कैसे कोई चीज जिंदगी की जरूरत बन जाती है- वह मोबाइल के बढ़ते प्रयोगों को देखकर लगता है। कैसे कोई चीज जिंदगी की जरूरत बन जाती है, वो मोबाइल के बढ़ते प्रयोगों को देखकर लगता है. वह हमारे होने, जीने में सहायक बन गया है। पुराने लोग बता सकते हैं कि मोबाइल के बिना जिंदगी कैसी रही होगी। किंतु आज यह मोबाइल खतरेजान हो गया है, क्या मोबाइल के बिना जिंदगी संभव है ? जाहिर है जो इसके इस्तेमाल के आदी हो गए हैं उनके लिए यह एक बड़ा फैसला होगा, पर मोबाईल एवं उसके टावरों से निकलने वाले रेडियेशन (विकिरण) के खतरे को भी हम कम नहीं आंक सकते, वह किस तरह अपने विकिरण से लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल रहा है। रेडियेशन के प्रभावों के चलते आदमी की जिंदगी में कई तरह की बीमारियां घर बना रही हैं वह इससे जूझने के लिए विवश है। जाहिर तौर पर यह एक ऐसा विषय है जिस पर व्यापक विमर्श आवश्यक ही नहीं अत्यावश्यक है। मोबाइल के प्रयोगों को रोका तो नहीं जा सकता हां कम जरूर किया जा किया जा सकता है। इसके लिए ऐसी तकनीकों का उपयोग हो जो कारगर हों और रेडियेशन के खतरों को कम करती हों। आज शहरों ही नहीं गांव-गांव तक मोबाइल के फोन हैं और खतरे की घंटी बजा रहे हैं। लोगों की जिंदगी में इसकी एक अनिवार्य जगह बन चुकी है। इसके चलते लैंडलाइन फोन का उपयोग कम होता जा रहा है और उनकी जगह मोबाइल फोन ले रहे हैं। ये फोन आज जरूरत हैं और फैशन भी। नयी पीढ़ी तो अपना सारा संवाद इसी पर कर रही है, उसके होने जीने और अपनी कहने-सुनने का यही माध्यम है।  इसके अलावा नए मोबाइल फोन अनेक सुविधाओं से लैस हैं वे एक अलग तरह से काम कर रहे हैं और नई पीढी को आकर्षित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। इसके अलावा नए मोबाइल फोन अनेक सुविधाओं से लैस हैं वे एक अलग तरह से काम कर रहे हैं और नई पीढी को आकर्षित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते. ऐसे में सूचना और संवाद की यह नयी दुनिया मोबाइल फोन ही रच रहे हैं। आज वे संवाद के सबसे सुलभ, सस्ते और उपयोगी साधन साबित हो चुके हैं। वे दरअसल हमारे एकांत के साथी बन चुके हैं. वे एक ऐसा हमसफर बन रहे हैं जो हमारे एकांत को भर रहे हैं वो भी चुपचाप। ऐसे में इस स्व चलित दुरभाष यंत्र के प्रयोगों से छुटकारा तो नामुमकिन है और इसका विकल्प यही है कि हम ऐसी तकनीको से बने फोन का इस्तेमाल करें या अपनाएं जिनमें रेडियेशन का खतरा कम हो, या नगण्य हो  हालांकि इससे मोबाइल कंपनियों को एक नया मार्केट मिलेगा और अंतत: लोग अपना फोन बदलने के लिए मजबूर होंगें।
भारत के लिए मोबाइल फोन विकिरण इसलिए भी खतरे की घंटी है, क्योंकि यहां का दूरसंचार उद्योग दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रहा है और वायरलेस कनेक्शनों की संख्या के मामले में यह विश्व में दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार नेटवर्क है। मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या में हर माह लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मोबाईल रेडियेशन के कुछ अन्य गैर ऊष्मीय प्रभाव जैसे सिर की त्वचा पर जलन व सिहरन, थकान, निद्रा में बाधा, चक्कर आना, एकाग्रता में कमी, कानों में घंटियां बजना, प्रतिक्रिया देने में वक्त लगना, याददाश्त कम होना, सिरदर्द, पाचन तंत्र में गड़बड़ी, दिल की धड़कन बढऩा इत्यादि भी संभव हैं। चिडिय़ा-गौरेया, मधुमक्खी, तितली, आदि कीटों की संख्या में कमी के लिए भी मोबाइल टावर से होने वाले रेडियेशन बहुत हद तक जिम्मेदार हैं. मोबाइल फोन रेडियो तरंगों के माध्यम से सिग्नल प्रेषित करते है। इन रेडियों तरंगों में रेडियो फ्रिच्ेंसी एनर्जी होती है जो इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडिएशन का ही एक रूप है। मोबाइल हैंडसेट के भीतर मौजूद सर्किट्स और उसके एंटिना से विकिरण संचारित होता है। यह विकिरण सभी दिशाओं में फैलता है, कहीं कम, कहीं ज्यादा। मोबाइल फोन का उपयोगकर्ता इस विकिरण का कितना हिस्सा अवशोषित करेगा, यह नेटवर्क में डिजिटल सिग्नल कोडिंग, एंटिना की डिजाइन और सिर के सापेक्ष उसकी स्थिति जैसे कई कारकों का निर्भर करेगा। 

विकिरण पर शोध

विकिरण दो प्रकार के होते हैं। एक, आयनीकारक विकिरण जिनसे टकराकर परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन निकल जाते हैं और ऑयन का निर्माण होता है। (जैसे एक्स-रे)। दूसरा, गैर-आयनीकारक विकिरण जिसमें आमतौर पर इलेक्ट्रॉन अलग नहीं होते हैं। यह उतना घातक नहीं माना जाता जितना कि आयनीकारक विकिरण होता है। इसमें वस्तु की सतह केवल मर्ग होती है। मोबाइल फोन और मोबाइल फोन टॉवरों से निकलने वाला विकिरण गैर-अयनीकारक होता है।
गैर-आयनीकारक विकिरण के साथ चिंता यह है कि इसका असर लंबे समय तक हो सकता है। हालांकि यह ऊतकों को तत्काल नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन जानकार इस बात को लेकर पक्के तौर पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है कि इस विकिरण के लगातार प्रभाव से किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
मोबाइल फोन के विकिरण का सबसे जाना-माना प्रभाव ऊष्मीय प्रभाव है जिसमें गर्मी संबंधी अधिकांश प्रभाव सिर की सतह पर होते हैं। ऊष्मीय प्रभाव मानव ऊतकों को उसी तरह गर्म करने की क्षमता रखता है, जैसे किसी माइक्रोवेव ओवन में खाना गर्म होता है। इसमें तापमान में बढ़ोत्तरी उससे भी कम होती है जितनी धूप में सिर खुला रहने पर होती है। मस्तिष्क के रक्तसंचार में यह क्षमता होती है कि वह खून के प्रवाह में बढ़ोत्तरी कर अतिरिक्त गर्मी के असर को खत्म कर सके। हालांकि आंख के कॉर्नियां में तापमान के नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं होती है।
भारत के लिए मोबाइल फोन विकिरण इसलिए भी खतरे की घंटी है, क्योंकि यहां का दूरसंचार उद्योग दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रहा है और वायरलेस कनेक्शनों की संख्या के मामले में यह विश्व में दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार नेटवर्क है। मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या में हर माह लगातार बढ़ोतरी हो रही है। गौरतलब है कि भारत में टॉवरों की स्थापना को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। यही वजह है कि हमारे शहरों में टॉवर या एंटिना का बहुत ही अव्यवस्थित जाल-सा बिछामिलेगा। मोबाइल टॉवर भी जगह-जगह कुकुरमुत्तें की तरह उगे जा रहे हैं।

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