शनिवार, 30 जून 2012

प्रकृति के प्रारंभ से ही प्राणियों में मनुष्यों और पaशु-पक्षियों के बीच भावनात्मक संबंध रहा है. परस्पर स्नेह और अपनत्व भाव के चलते सभी एक दूसरे के अनुरुप मद्दगार भी साबित होते रहे हंै. आदमजात और शांति के दूत कहे जाने वाले कपोतों (कबूतरों) के बीच का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है प्रति इन्सानों की स्नेहिल भावनाएं अभी भी जीवित है. सरायपाली जिले का अकेला ऐसा केंद्र है जिसे कबूतरों का नगर कहा जा सकता है. यहां पर जनसंख्या के समतुल्य की आधी आबादी संख्या में कबूतर निर्भय होकर वास करते हैं. वर्तमान में सरायपाली का भीड़-भरा कोलाहलमय माहौल कबूतरों के लिए सर्वथा अनुकूल बना हुआ है. यहां के दर्जनों मकानों में कबूतर निर्भय होकर निवास करते हंै. नगर के पशु-पक्षी प्रेमी नागरिक भी कबूतरों को मक्का-गेहूं, बाजरा चुगाने सड़क किनारे दाने बिखराने से पीछे नहीं रहते. जब सड़कों पर कबूतरों का झुंड दाना चुगने उतरता है तब का दृश्य काफी विहंगम होता है. सरायपाली के लोग तो इसके हर दिन के गवाह है. लेकिन, प्रवासियों के स्मृति पटल पर कबूतरों की अटखेलियों लम्बे समय के लिए स्मरणीय होकर रह जाती है.

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